Tuesday, October 9, 2012

Detracted Agnivesh puts dilema in Arya activities. एषणाओं की तृष्णा बुझाने की दौड़ में अग्निवेश ..

एषणाओं की तृष्णा बुझाने की दौड़ में अग्निवेश 


~ महेंद्रपाल आर्य 

आजमगड़ जिला राजी की सराय के पास १९,२०,२१ नवम्बर २००५ में जमाते इस्लामी का तिन दिवसीय अधिवेशन मनाया गया था, इसमें भाग लेने वालो में वक्ता के रूप में अग्निवेश भी थे ।

अग्निवेश २१ नवम्बर, रविवार के दिन मुसलमानों को खुश करने के लिए सभी मर्यादाओं को दाव पर लगा दिया । यद्दपि इससे मेरा कोई लेना देना नही था किन्तु दैनिक जागरण २१ नवम्बर के पृष्ट ९ पर चित्र स
हित वाराणसी अंक में लिखा 'स्वामी अग्निवेश अध्यक्ष्य आर्य समाज कान्फ्रेन्स को संबोधित कर रहे
 हैं । 
अग्निवेश को आर्य समाज का 'अधक्ष ' लिखा जबकि जागरण वालों को पता ही नहीं अग्निवेश किसके अध्यक्ष है ? आर्य जनों, मैं अग्निवेश के दिए वक्तव्य व उसकी समीक्षा लिखना और समग्र आर्य जनों को अवगत करना अपना कर्त्तव्य समझ रहा हूँ । मानव एषनाओं की वशीभूत होकर क्या नही कर सकता ? अग्निवेश ने अपना व्यक्तव्य बिसमिल्ला हीर रहमा निर्रहीम से प्रारम्भ किया । जबकि आर्य समाज के संस्थापक ऋषि दयानन्द ने अपने अमर ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश के चौदह सम्मुल्लास में इसे ही गलत सिद्ध किया है । 
आर्यों का एक काल तो वो भी था जड़ स्वामी श्रद्धानन्द जी ने दिल्ली की जमा मस्जिद से अपने व्यक्तव्य को प्रारम्भ किया था वेद मन्त्रों से । त्वमहिनः पिता वसो त्वम् माता शतकुत से और आज एषनाओं की तृष्णा बुझाने वाले अग्निवेश ने वेद छोड़ कर कुरान को पकड़ लिया । जबकि ऋषि दयानन्द तथा स्वामी श्रद्धानन्द ने कुरान के मानने वालों को सत्य के आधार पर कुरान छुड़वाकर वेद पकड़वाए थे । किन्तु दयानन्द और श्रद्धानन्द का गला घोट कर अग्निवेश आर्य समाज के अध्यक्ष कहलाने में जराभी लज्जा महसूस नही करते ।
वेद और कुरान अगर एक होता तो फिर स्वामी श्रद्धानन्द की पं लेखराम की महाशय राजपाल की तथा भाई श्यामलाल की हत्या क्यों और कैसे होती ? अग्निवेश लोकेषणा के कारन वैदिक मर्यादाओं को ताक पर रखते हुए आर्य समाज का भी गला घोटकर अपनी तृष्णा बुझा कर मुसलमानों को संतुष्ट कर रहे हैं । न मालूम ऋषि दयानन्द तथा स्वामी श्रद्धानन्द जीकी आत्मा इश्वर व्यवस्था के अनुसार कहाँ है ? मेरे बिचार से उन महापुरुषों की आत्मा जहाँ कहीं भी होगी अग्निवेश के इन क्रियाकलापों को , चाल - चलन को व एषणाओं में डूबा देखकर अव्यश्य रो रही होगी । यह भी कह रहे होंगे की जिस वेद को जो ईश्वरीय ज्ञान है ; विषपान कर प्राणों की बाजी लगाकर न मालूम आर्य समाज के शाश्त्रार्थ महारथियों ने कितने ही इस्लाम जगत के बिद्यनों को परास्त किया तथा इस्लाम और कुरान के जानकारों को कुरान छोड़ वेद को ईश्वरीय ज्ञान मानने को बाध्य किया ।
अब उनके दिए गये व्यक्तव्य को देखें । दैनिक जागरण ने लिखा " स्वामी अग्निवेश अध्यक्ष आर्य प्रतिनिधि सभा ने जमायते इस्लामी के तिन दिवसीय कान्फ्रेन्स के अंतिम दिन रविवार को उन्होंने बिसमिल्ला हीर रहमा निर्रहीम से अपनी बात सुरु की । उन्होंने कहा की जमायते इस्लामि के मंच से सर्बप्रथम मैं पैगम्बरे इस्लाम हजरत मुहम्मद साहब को नमन करता हूँ । जिन्होंने जिन्दा बेटिओं को गाड़ने से रोका । औरत और मर्द के बीच अपमान जनक व्यवहार को दूर किया । औरोतों को सम्मानपूर्वक जीने का हक दिया है । उसका अनुपालन ही साडी समस्यायों का हल है । स्वामी जी ने औरत और मर्द के बीच बेइनसाफी पर बिस्तृत बयान कर जन सैलाब को काफी प्रभाबित किया "।
आगे और भी है परन्तु येहीं तक अग्निवेश के बयान में ही वैदिक मान्यताओं का गला घोट कर रख दिया । प्रथम मैं उसकी सुरुयात पर लिख जुका हूँ । अग्निवेश ने कहा 'सर्बप्रथम मैं पैगम्बरे इस्लाम हजरत मुहम्मद साहब को नमन करता हूँ' जो वैदिक मान्यता ही नहीं अपितु इस्लाम पर भी कुठाराघात है । क्योंकि वैदिक मान्यतानुसार एक परमात्मा को छोड़ और किसीको नमन नही करना चाहिये । और इस्लाम में भी अल्लाह को छोड़ किसी और के पास झुकना ही शिर्क है ।अग्निवेश एक तरफ तो आर्य समाज कहीं आर्य प्रतिनिधि सभा , फिर कहीं सार्वदेशिक सभा के अधक्ष बता रहे है अपने को । इधर वैदिक मान्यता को जानते तक नहीं । विशेषकर मैं  सामवेदी से जानना चाहूँगा क्या आप वेद को जानते भी है ? या मात्र नाम ही सामवेदी लिखते है ? अगर वेद को जानते तो फिर अग्निवेश के इस पद विरुद्ध वक्तव्यों को स्वीकार कैसे करते ? उनको गुरु मानकर पीछलग्गू हो कर वैदिक सिद्धांत के जानने व मानने वालों को धोखा कैसे देते ? यादव जी पर मैं दया करता हूँ क्योंकि वह आर्य नही है यादव है पर आप तो सत्य के व्रती सामवेदी अपने नाम से लिख कर दुनिया को बताते हैं ।
अब जमाते इस्लामी वालों की भी बुद्धि मारी गई । उनके मंच पर ही शिर्क का प्रतिपादन हुआ । जहाँ मस्जिदे अक्सा के इमाम भी मौजूद थे । आर्य लोगों एक बात का ध्यान रखना आर्य समाज के संस्थापक ऋषि दयानन्द की मात्र बात थी इश्वर के अतिरिक्त मूर्ति के सामने नमन न करने की। आज आर्य समाज का नाम लेकर दयानन्द का अपमान मात्र लोकेषणा की तृष्णा बुझाने के लिए अग्निवेश ने वैदिक सिद्धांतों को ताक पर रख दिया ।  अब इस्लाम के मानने वालों को देखे , मोहनदास करमचंद (महात्मा) गाँधी का पुत्र हीरालाल गाँधी ने, जब अब्दुल्ला गाँधी बनकर इस्लामिक मंच पर कहा था - हे अल्लाह अगले जन्म में किसी मुस्लमान के घर जन्म देना , इतने कहने पर मुसलमानों ने मंच से निचे गिराया था । और उसी मंच से अल्लाह को छोड़ मुहम्मद को नमन की बात ऐसे सिद्धान्तहीन लाल वस्त्रधारी गैर मुस्लिम से सुनने हेतु तौहीद व अल्लाह की वहदानियत को भी तिलांजलि दिया गया क्योंकि वह लोग भी एषणाओं से ग्रसित हैं । 
आगे और देखे हजरत मुहम्मद ने औरत - मर्द के बीच अपमान जनक व्यव्हार को रोका । पर आर्य जनों को बखूबी मालूम है की इस्लाम के जन्म काल से आज तक औरत व मर्द में समानता नहीं है । आज भी शरीयती कानून में पुरुष के मुकाबले में दो औरतों को गवाही देनी होती है । फिर पिता के सम्पत्ति में भी पुत्र व पुत्री बराबर के हकदार नहीं । मात्र बेटी रुपयों में चौअन्नी की हकदार है । पति की सम्पत्ति में मात्र पत्नी दो आने की आधिकारी है ।अल्लाह ने कुरान की निसा आयात तिन में फरमाया " निसओकुम हर सुल्लाकुम फतु हर सकुम अन्ना शोतुम व कद्देमु ले अनफुसे कुम "।

अर्थात औरत मर्द के खेत हैं, उस खेत से जैसा चाहो फसल उत्पन्न करो, यहाँ औरोतों की मर्यादा मात्र बछा पैदा करने का यन्त्र बताया , सूरा बकर में कहा गया, '' लिबासुल्ला कुमवअनतुम लिबासुल्ला हुन्ना'' जिसका अर्थ है - स्त्री और पुरुष एक दुसरे की परिधान हैं । पेहेन्ने का कपड़ा अर्थात मैला हो बदल लो, धो लो, मैला कर भी सकते हो, साफ़ भी रख सकते हो, दाग लगा सकते हो और नही भी । 


अल्लाह के पास भी औरत, मर्द में अन्तर है, मर्दों को मस्जिद में जमात के साथ नमाज का आदेश है और औरतों की जमात नहीं होती, न मालूम अग्निवेश को इस्लाम में औरत मर्द में बराबरी कहाँ दिखाई पड़ी ? अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए कुछ भी कहने को तैयार हैं अग्निवेश ।

वह रे ! युगप्रवर्तक ऋषि देव दयानन्द कैसे करूँ तुम्हे याद , आपने औरत व मर्द के लिए सामान अधिकार मुहैया कराते हुए मानवता पर बहुत बड़ा उपकार किया । जब तक यह सृष्टी रहेगी तब तक आपको हर पीड़ी याद रखेगी ।


आर्य जनों को एक बात मैं और भी बता दूँ की अग्निवेश हिन्दुओं को या आर्य जनों को गाली दे कर ईसाई व मुसलमानों की मात्र हमदर्दी नहीं ले रहे हैं अपितु नोट भी कमा रहे है । अग्निवेश का जितना विरोध हम करेंगे, अग्निवेश को उतनी ही हमदर्दी उन लोगों से मिलेगी । येही कारन है कि हमारे आर्य जगत के विद्यनों ने इतना कुछ लिख कर सामान्य तरीके से लिखा । मैं भी मात्र आर्य जानो को सच्चाई तथा यथार्थ दर्शाने हेतु लिखता हूँ । वरना अग्निवेश क्या है आर्य लोगों के सामने ? जिन अंग्रेजों के खिलाफ आर्यों ने बिगुल बजाया और भारत से अंग्रेजों को खदेड़ कर रहे । इन शूरवीरों से क्या मुकाबला ? किउंकि मछर भगाने के लिए तोप कि आवश्यकता नहीं होती, पर याद रखना जिस दिन धैर्य का बांध टूटेगा उस दिन वैदिक सिद्धांतों के रक्षार्थ आर्य लोग अपने आर्यत्व का जलवा अवश्य दिखा देंगे ।
 


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